‘मानव जीवन का उद्देश्य – The Secret Of Human Life’

The Secret Of Human Life'
The Secret Of Human Life’

यह बड़ी अजीब बात है कि लोगों के सोच और उनके कर्म में कितना अंतर होता है। वहीँ यह बात भी सर्वमान्य है की कर्म सोच का ही परिमार्जित रूप होता है। फिर इस दोहरे मानदंड का अर्थ क्या है? ऐसी कौन सी अवस्थाएं हैं जो लोगों को उनके उद्देश्य से भटका देतीं हैं, अंतरात्मा की आवाज़ को दबा देतीं हैं? इस बात को स्पष्ट करने के लिए मानव जीवन का एक सुक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है।

अब तक यह बात सर्वमान्य रही है की एक शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड को नियंत्रित एवम् संचालित करती है। उसे चाहे ईश्वर नाम दें या प्रकृति। यही बात पृथ्वी और इसपर उपस्थित सभी जीवधारियों पर भी लागू होती है। यद्यपि कि हमारे अन्वेषण का केंद्र बिंदु मानव जीवन और उसकी प्रवृत्ति है तथापि एक नियम या प्रवृत्ति समस्त जीवधारियों में सामान है और वह है अपने अस्तित्व को बनाए रखने की प्रवृत्ति। जाने अनजाने सभी जीवधारी अपने तथा अपने समुदाय का अस्तित्व बनाये रखने का हर संभव प्रयास करते हैं और यह बात प्रमाणित हो चुकी है की पृथ्वी पर उन्ही जीवधारियों का अस्तित्व शेष बचा है जिन्होंने वातावरण के अनुकूल स्वयं को ढालने के लिए संघर्ष किया और अपने समुदाय को भी इसके लिए प्रेरित किया। अर्थात जीवन का संघर्ष ही एक ऐसी प्रवृत्ति है जो सभी जीवधारियों में एक समान है।

मनुष्य पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है और इस श्रेष्ठता का मूल है प्रकृति प्रदत्त मानव मस्तिष्क की शक्ति, उसकी कल्पनाशीलता दूरदर्शिता, विचारशीलता, आकलन संवेदना आदि। इन्ही गुणों के बल पर मानव ने अन्य जीवों पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध किया है। लेकिन अगर प्रकृति ने मनुष्य को इन विशेष गुणों से परिपूर्ण बनाया है तो इसके पीछे अवश्य ही कोई निश्चित उद्द्येश्य होगा।

मानव जीवन जिसे मनुष्य को विधाता का दिया हुआ सर्वोत्तम उपहार कहा जाय तो अतिश्योक्ति नही होगी। क्योंकि कोई व्यक्ति तभी महान बनता है जब वह अपनी महानता के चरम पर पहुचने तक जीवित रहे। वह एक घंटे या एक दिन में महान नही बन सकता। ऐसा भी देखने मे आता है की साधारण मनुष्य भी अनायास ही कभी कोई बड़ा कार्य कर जाता है तो क्या वह महान हो गया? नही, क्योंकि महानता तो वह कसौटी है जिसपर महान व्यक्ति हर सम-विषम परिस्थितियों में स्वयं को खरा उतारता है। अर्थात जीवन ही मनुष्य को महान बनने का अवसर प्रदान करता है।

लेकिन जीवन का लाभ वही उठा पाते हैं जो इसके उद्देश्य को पहचानते हैं। बिना उद्देश्य के हम किस मार्ग पर चलेंगे कहना कठिन है। परिस्थितियां मनुष्य को तब तक महान नहीं बना सकती जब तक वह स्वयं उन परिस्थितियों का लाभ उठाना न चाहे।

शायद ही कोई इस बात से इनकार करे की सुख की चाह सभी को होती है चाहे वह महान हो या साधारण, धर्मात्मा हो या अधर्मी, पुजारी हो या पापी। यह बात अलग है की सबके लिए सुख के मायने अलग हैं, उसे प्राप्त करने का साधन अलग है।

लेकिन सुख का अर्थ क्या है? जहाँ तक मैं समझता हूँ सुख का आशय संतुष्टी से है और यदि मनुष्य कर्म करके भी संतुष्ट न हो तो वह उस सुख से वंचित रह जाता है जिसके लिए वह कर्म करता है। कर्म कोई भी हो सकता है। कुछ ईर्ष्यालु जनों को दूसरों की निंदा करके, उनका तिरस्कार करके, दुःख पहुँचा के सुख का अनुभव होता है, धर्मात्मा को अपने धर्म का पालन करके और महत्वकांक्षी अपने महत्त्व को प्राप्त करके सुख का अनुभव करता है। यह कितनी आश्चर्यजनक बात है की सुख देने पर भी सुख की इच्छा और दुःख देने पर भी सुख की इच्छा। यह बात अलग है की कोई अपने प्रयोजन मे सफल न हो लेकिन इच्छा तो वह सुख की ही करता है।

अर्थात सुख जीवन के उद्देश्य का एक आधार स्तंभ है। अपने आप को सुखी रखने के लिए लोग तरह तरह के दुःख उठाते हैं। किसी पर उपकार भी करते हैं तो इस आशा मे की शायद वह बुरे दिनों में काम आ जाए। हम अपने सगे-सम्बन्धियों को अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व क्यों देते हैं? ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना केवल भावना है जो सहज रूप मे चरितार्थ नही हो सकती। यद्यपि कुछ लोग अपवाद हैं लेकिन हमारा तात्पर्य जन-साधारण से है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता की जीवन का अधिकांस समय लोग अपने आप को सुखी बनाने में व्यतीत करते हैँ।

अतः उपरोक्त प्रसंगों से मानव जीवन के दो उद्देश्य सामने आते हैं-

1- अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष
2- सुख प्राप्त करने के लिए संघर्ष

लेकिन इसमें भी आदर्श स्थिति क्या हो सकती है? क्या किसी का तिरस्कार करके, विश्वासघात करके, चोरी करके हमें स्थाई सुख मिल सकता है? नहीं मिल सकता। यह छडिक उमंग की स्थितियां हैं जो भावनाओं के रूप में मस्तिष्क में आती हैं। उदाहरणार्थ अगर कोई आपका अहित करे या करने की सोचे तो आपके मन में भी यह बात आना स्वाभाविक है की आप भी उसका अहित करें। अगर वह अपने प्रयोजन में सफल हो जाए तो आपके मन मे ईर्ष्या और क्रोध की भावना और प्रबल होगी जो आपको सुख की बजाए दुःख की ओर ले जाएगी और यह स्थिति दोनों के लिए अहितकर और निराशाजनक होगी क्योंकि दोनों पक्ष एक दूसरे को दुःखी करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन हमारे अन्वेषण का केंद्र बिंदु वह संतुष्टी है जो मानव जीवन को प्रगतिशील ऊर्जावान तथा महान बनाती है।

मानव जीवन में लक्ष्य का स्पष्टीकरण आवश्यक है। वर्तमान समय मे मनुष्य के सामने कुछ विशेष समस्याएँ हैं और उन समस्याओं का समाधान भी उपलब्ध है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है की अमुक समस्या का समाधान ही हमारे जीवन का उद्देश्य भी है। बेरोजगार के लिए रोजगार पाना उनका लक्ष्य है, भूखे का लक्ष्य भोजन है। लेकिन जैसे ही लक्ष्य प्राप्त हो जाता है उसका महत्त्व हमारे लिए कम हो जाता है और हम नए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करने लगते हैं। अर्थात हमारे जीवन मे लक्ष्य निरंतर बदलते रहते हैं और उन्हें प्राप्त करने का साधन भी।

वर्तमान समय में, विशेषकर भारत जैसे विकासशील देशों में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है और आज के अधिकांस युवा अच्छा रोजगार प्राप्त करना अपने जीवन का मूल उद्देश्य मानते हैं। कुछ हद तक उनका सोचना ठीक भी है क्योंकि यह सोच प्राकृतिक है और अनजाने में ही सही वो प्रकृति के ‘संघर्ष के नियम’ का अनुपालन कर रहे हैं।

लेकिन हम मनुष्य हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य व्यापक है। रोजगार तो जीविकोपार्जन का साधन मात्र है। और अगर हम इसे ही अपने जीवन का उद्देश्य मान लेंगे तो मनुष्य और बाकी जीवधारियों में अंतर नहीं रह जायेगा क्योकि सारे जीव किसी न किसी तरह संघर्ष करके ही पृथ्वी पर अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल हुए हैं।

आज साहित्य में सफलता प्राप्ति विषय पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है पर हमारी सोच को परिष्कृत करने के लिए यह सामग्री कम पड़ जाती है। आखिर सफलता है क्या? क्या अच्छा रोजगार, व्यापार, धन प्राप्ति जीवन की सफलता का द्योतक है? यह प्रश्न सामान्य से अधिक महत्वपूर्ण है। क्या इस प्रकार सुविधासम्पन्न व्यक्ति जीवन से संतुष्ट या सुखी है? कह नहीं सकते? हो भी सकता है और नहीं भी। फिर ऐसा कौन है जिसको सफल और महान कहा जाए?

हमारी संस्कृति और इतिहास इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सफल और महान उन्ही व्यक्तियों को कहा गया है जिन्होंने अपने संचित ज्ञान का सदुपयोग किया और अधिक से अधिक प्रसार भी किया। अर्थात ज्ञान प्राप्त करना उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्वपूर्ण उसका सदुपयोग और अधिक से अधिक हस्तान्तरण। चाहे वह विज्ञान का क्षेत्र हो, खेल-कूद, साहित्य, कला, चिकित्सा शास्त्र, धर्मशास्त्र हो, हर क्षेत्र में महान और सफल हुए महापुरुषों की एक लंबी सूची है और इस सूची में उनका ही नाम है जिन्होंने अपने संचित ज्ञान का अधिक से अधिक सदुपयोग किया और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया।

अतः आज की युवा पीढ़ी पर इस बात की जिम्मेदारी है कि वह लीक से हटकर सोचे और अपने जीवन से कुछ सकारात्मक परिणाम निकाले। जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए मार्ग तो अनेक हैं लेकिन उनपर चलने की प्रेरणा हम अपने उन पूर्वजोँ से लें जिन्होंने अपने संचित ज्ञान का अधिकाधिक सदुपयोग किया और अपनी विचारधारा, विश्लेषण एवं अन्वेषणों के माध्यम से हमारा मार्ग भी प्रसस्त किया।

ज्ञान को न सिर्फ प्राप्त किया जाए बल्कि इसका उपयोग कुछ इस तरीके से किया जाए जिससे इसका लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे। ऐसा करके आप सफलता के नए आयाम स्थापित करें तो आश्चर्य नहीं। आज सूचना प्रौद्योगिकी ने ज्ञान का प्रसार और भी आसान कर दिया है। पुराने समय में हमारे महर्षियों, धर्मशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और साहित्यकारों आदि ने संसाधन कम होने पर भी अपने कृतियों के माध्यम से अपने को अमर कर गए। फिर आज तो आपके पास प्रिंट मिडिया और इंटरनेट जैसे संसाधनों के अनेक ऐसे अमोघ अस्त्र हैं जिनका वार खाली नहीं जा सकता बशर्ते उसे सही दिशा में चलाया जाए।

अतः अब आवश्यकता है तो एक संकल्प की, एक विचारधारा विकसित करने की, अपने आपको शिक्षित करने की और विभिन्न संसाधनों की सहायता से संचित ज्ञान के प्रसार की। ऐसा करके आप न सिर्फ अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध करेंगे बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन जाएंगे। और एक सत्य ये भी है कि अभिव्यक्ति आत्म संतुष्टी का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है जिसे प्राप्त करने के लिए हम अपनी दिनचर्या मे अनेक निरर्थक प्रयास करते हैं।

Written by
Kaushal Shukla
22 Sep 2016

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