अपने ठिकाने आ गए – ‘कलाम-ए-शायर’ – The experience speaks

​जिंदगी के कुछ फ़साने, हम सुनाने आ गए,
मजलिसों में हम भी किस्मत आजमाने आ गए।

जब किसी के सामने रोया तो रुसवाई मिली,
इसलिए महफ़िल में हम हँसने-हँसाने आ गए।

मंजिलों का क्या, कहाँ, कब तक मिलेंगी, क्या पता?
हम तो यारों रास्तों को मुंह चिढ़ाने आ गए।

फासले कैसे भी हों, ये फासले मिट जाएंगे,
दिल से दिल तक प्यार का हम पुल बनाने आ गए।

धूप से बेहाल होकर कुछ मुसाफिर थक गए,
फिक्र है हमको, उन्हें पानी पिलानें आ गए।

उड़ने वाले ये परिंदे बाज़ से डरकर छिपे,
हौसला देकर इन्हें, हिम्मत बढ़ाने आ गए।

हो गई हद इस रियाज-ए-जिंदगी के साज की,
इसलिए बिन साज के ही सुर लगाने आ गए।

दोस्ती, चाहत, वफ़ा की बात सब करते मगर,
वक्त पर, मजबूरियाँ अपनी जताने आ गए।

खुद के जख्मों की नहीं परवाह, हम भी सिरफिरे,
दुसरे के घाव पर मरहम लगाने आ गए।

इस कदर मशगूल थे, यह जिंदगानी का सफ़र,
कुछ पता ही ना चला, अपने ठिकाने आ गए।

इस किताब-ए-जिंदगी से जो सबक मिलता रहा,
वह सबक हम आम लोगों को बताने आ गए।

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