जीवन-पथ पर, धीरे-धीरे, राही पाँव बढ़ाए – एक गीत

कुटिल नियति के फेर में पड़कर मंद-मंद मुस्काए
जीवन-पथ पर धीरे-धीरे राही पाँव बढ़ाए

वादे झूठे, कसमें झूठीं, झूठा प्रेम निभाया
फिर भी न जानें, क्यों नहीं माने, ऐसा दिल भरमाया
दिल की बातें दिल ही जाने, कौन इसे समझाए
जीवन-पथ पर धीरे-धीरे राही पाँव बढ़ाए

पंथ अकेला, मन अलबेला, तनिक नहीं घबराए
यादें उमड़े नई-पुरानी, छंद स्वतः बन जाए
झंकृत करता तार हृदय का, सबको गीत सुनाए
जीवन-पथ पर, धीरे-धीरे, राही पाँव बढ़ाए

सबकुछ भूल गयी है दुनियां, धन-दौलत के पीछे
अंधेपन का शौक चढ़ा है, दौड़े आँखे मीचे
किन्तु समय की ठोकर पे क्यों, नैना नीर बहाए
जीवन-पथ पर, धीरे-धीरे, राही पाँव बढ़ाए

6 thoughts on “जीवन-पथ पर, धीरे-धीरे, राही पाँव बढ़ाए – एक गीत

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