‘मनुष्य: पृथ्वी का सबसे बड़ा खतरा – Earth’s Danger Begins Now-Who Is Responsible?’

Earth's Danger

यदि मानव समाज सजग और एकजुट होकर सक्रिय कदम उठाए तो क्या संभव नहीं है। पहल तो करनी ही होगी। विकास होना आवश्यक है लेकिन पृथ्वी के विनाश की शर्त पर नहीं। पृथ्वी है तो जीवन है और जीवन है तो मानव समाज और अन्य जीव। मनुष्य विवेकशील है अतः अपने विवेक का प्रयोग मानव समाज को पृथ्वी के बचाव की दिशा में करना ही पड़ेगा नहीं तो कुछ भी बचना संभव नहीं है और लाखों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद सभ्य बना मानव अपनी असभ्यता के कारण थोड़े ही समय में राख के ढेर में तब्दील हो जायेगा।